Sahibzada Zorawar SinghSahibzada Zorawar Singh aur Sahibzada Fateh Singh


Sahibzada Zorawar Singh
Sahibzada Zorawar Singh




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धर्म की नींव में दफ़्न दो सूरज

(25–26 दिसंबर 1705 की अमर गाथा)

H1-भाग – 1 (भावनात्मक कहानी शैली, अत्यंत विस्तार से)


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रात बहुत ठंडी थी।
आसमान में तारे ऐसे काँप रहे थे जैसे धरती पर होने वाले महाविनाश को पहले ही महसूस कर रहे हों।
आनंदपुर साहिब की हवाओं में आज कुछ अलग सा कंपन था —
जैसे इतिहास अपनी साँस रोककर किसी निर्णय की प्रतीक्षा कर रहा हो।

यह केवल एक शहर नहीं था।
यह धर्म की प्रयोगशाला था।
यहीं से उठी थी वह चिनगारी, जिसने गुलामी की जंजीरों को चुनौती दी थी।

और उसी चुनौती का नाम था —
दसवें पातशाह, श्री गुरु गोबिंद सिंह जी।


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आनंदपुर : जहाँ बच्चे भी शेर थे

आनंदपुर साहिब में बच्चे खेलते नहीं थे,
वे कहानी नहीं — इतिहास बनना सीखते थे।

साहिबज़ादा ज़ोरावर सिंह और साहिबज़ादा फ़तेह सिंह
अभी बहुत छोटे थे।

लेकिन उनकी आँखों में —

भय नहीं

मासूमियत से अधिक गंभीरता थी


माता गुजरी जी उन्हें अक्सर कहा करती थीं —

> “पुत्रो, शरीर छोटा हो सकता है,
पर आत्मा कभी छोटी नहीं होनी चाहिए।”



गुरु गोबिंद सिंह जी अपने पुत्रों को
तलवार नहीं — सत्य थमाते थे।


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औरंगज़ेब की बेचैनी

दिल्ली के तख़्त पर बैठा औरंगज़ेब
रातों की नींद खो चुका था।

क्योंकि आनंदपुर में
एक ऐसा विचार जन्म ले चुका था
जिसे न सेना मार सकती थी
न फ़रमान।

उसने आदेश भेजा।

पहाड़ी राजा, मुग़ल सेनाएँ —
सबने मिलकर आनंदपुर को
लोहे की बेड़ियों में जकड़ लिया।


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भूख, प्यास और परीक्षा

दिन बीते।
महीने बीते।

अनाज समाप्त।
जल स्रोत बंद।

माएँ बच्चों को
आँसू छुपाकर खाना देती थीं।

पर गुरु गोबिंद सिंह जी का स्वर अडिग था —

> “धैर्य भी एक हथियार है।”




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झूठी क़सम का जाल

एक दिन संदेश आया।

क़सम।
पवित्र ग्रंथ की क़सम।

“यदि आप आनंदपुर छोड़ दें,
आपको सुरक्षित मार्ग दिया जाएगा।”

माता गुजरी जी की आँखों में चिंता थी।
लेकिन गुरु जी ने कहा —

> “कभी-कभी छल को भी उजागर करना ज़रूरी होता है।”




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25 दिसंबर 1705 : वह रात

वह रात इतिहास की सबसे ठंडी रातों में से एक थी।

सरसा नदी
उफान पर थी।

पानी नहीं —
जैसे क्रोध बह रहा हो।

जैसे ही काफ़िला नदी में उतरा —

तीर चले

तलवारें चमकीं

चीखें उठीं


और उसी अराजकता में —

इतिहास का सबसे दर्दनाक दृश्य घटा।


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बिछुड़ना

एक हाथ छूटा।
एक आवाज़ डूब गई।

माता गुजरी जी
अपने पोतों के साथ
भीड़ में खो गईं।

न गुरु जी दिखे।
न बड़े साहिबज़ादे।

सिर्फ़ अंधेरा था।
और ठंड।


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गंगू : विश्वास का पतन

गंगू —
जो कभी गुरु घर का सेवक था,
आज उन्हें अपने गाँव ले आया।

पहले सहानुभूति।
फिर लालच।

रात में
उसने चुपके से
मुग़ल चौकी को सूचना दी।

कुछ सिक्कों की खनक में
उसने आत्मा बेच दी।


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गिरफ़्तारी

सैनिक आए।

माता गुजरी जी ने
अपने पोतों को सीने से लगा लिया।

ज़ोरावर सिंह ने पूछा —

> “दादी माँ, क्या डरना चाहिए?”



माता जी ने उत्तर दिया —

> “नहीं बेटा,
शेर कभी डरते नहीं।”




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सरहिंद : ठंडा बुर्ज

उन्हें एक बुर्ज में डाल दिया गया।

ऊपर से खुला।
नीचे पत्थर।

सर्द हवा
हड्डियों में उतर रही थी।

दो छोटे शरीर
और एक वृद्ध देह।

पर आत्मा — अडिग।


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रातें और बातें

रात में
माता गुजरी जी
कहानियाँ सुनाती थीं।

गुरु नानक से लेकर
गुरु तेग बहादुर तक।

और अंत में कहतीं —

> “यदि धर्म बचाना पड़े,
तो जीवन छोटा सौदा है।”



साहिबज़ादे
चुपचाप सुनते थे।


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यहीं पर भाग – 1 समाप्त होता है।

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H2-भाग – 2 : ठंडे बुर्ज से दरबार तक


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ठंडे बुर्ज की वह रात
सिर्फ़ सर्द नहीं थी —
वह मानवता की परीक्षा की रात थी।

हवा सीटी मार रही थी।
ईंटें ठंडी थीं।
आसमान खुला था।

माता गुजरी जी ने
अपनी काँपती शॉल को
दो नन्हे शरीरों पर फैलाने की कोशिश की।

माँ की गोद में इतिहास

साहिबज़ादा फ़तेह सिंह
नींद में भी काँप रहा था।

माता जी ने उसके बाल सहलाए।

> “ठंड से नहीं बेटा,
केवल अन्याय से डरना।”



ज़ोरावर सिंह ने पूछा —

> “दादी माँ,
क्या पिताजी हमें ढूँढ रहे होंगे?”



माता गुजरी जी की आँखें नम हो गईं,
पर स्वर दृढ़ था —

> “पिता कभी अपने शेरों को नहीं भूलते।”




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सुबह का कठोर सच

अगली सुबह
दरवाज़ा खुला।

सैनिकों की आवाज़ें।
लोहे की टकराहट।

> “चलो, दरबार में हाज़िर होना है।”



बच्चों ने एक-दूसरे का हाथ थाम लिया।

डर नहीं था।
बस एक अजीब सी शांति थी।


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वज़ीर ख़ान का दरबार

दरबार सजा था।

संगमरमर।
कालीन।
सोने की सजावट।

एक ओर
हथियारों से लैस सेनाएँ।

दूसरी ओर
दो छोटे बच्चे
और एक वृद्ध माँ।

सत्ता की आवाज़

वज़ीर ख़ान ने ऊपर से नीचे देखा।

> “ये हैं गुरु गोबिंद सिंह के पुत्र?”



दरबार में हँसी गूँजी।

नन्ही आवाज़, भारी शब्द

ज़ोरावर सिंह आगे बढ़े।

> “हाँ।
और हमें गर्व है।”



हँसी रुक गई।


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प्रलोभन

वज़ीर ख़ान बोला —

> “बच्चों,
इस्लाम क़बूल कर लो।
तुम्हें महल मिलेगा,
धन मिलेगा,
जीवन मिलेगा।”



फ़तेह सिंह ने शांत स्वर में कहा —

> “धर्म सौदे में नहीं बिकता।”




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धमकी

काज़ी आगे बढ़ा।

> “सोच लो।
मृत्यु सामने है।”



ज़ोरावर सिंह बोले —

> “मृत्यु तो एक दिन आनी ही है।
कायर की भी,
वीर की भी।
फर्क़ बस इतना है
कि इतिहास किसे याद रखता है।”



दरबार सन्न।


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फ़ैसला

वज़ीर ख़ान का चेहरा कठोर हो गया।

> “इन्हें ज़िंदा दीवार में चिन दिया जाए।”



एक क्षण के लिए
किसी सैनिक की आँख झुकी।

पर आदेश आदेश होता है।


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H3-भाग – 3 : दीवारें जो बोल उठीं


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ईंटें लाई गईं।

चूना घोला गया।

एक-एक ईंट
मानो इतिहास की साँसें रोक रही हो।

अंतिम संवाद

माता गुजरी जी को दूर रखा गया।

पर उनकी आत्मा
हर क्षण साथ थी।

साहिबज़ादा फ़तेह सिंह ने कहा —

> “भैया,
दर्द होगा?”



ज़ोरावर सिंह मुस्कराए —

> “धर्म के लिए
दर्द भी आशीर्वाद होता है।”




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दीवार उठती गई

पहली ईंट —
पैर ढके।

दूसरी —
घुटने।

तीसरी —
छाती।

पर चेहरों पर
कोई भय नहीं।

सिर्फ़ जप।

> “वाहेगुरु…
वाहेगुरु…”




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अंतिम क्षण

जब ईंटें गर्दन तक पहुँचीं,
तो एक सैनिक काँप गया।

> “हुज़ूर,
ये तो बच्चे हैं…”



वज़ीर ख़ान चीखा —

> “चुप!
ये विचार हैं,
और विचार सबसे ख़तरनाक होते हैं।”




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शहादत

एक अंतिम ईंट।

दो नन्हे शरीर
शांत।

पर आत्माएँ
अमर।


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माता गुजरी जी

जब माता जी को समाचार मिला,
उन्होंने आँखें बंद कर लीं।

कोई चीख नहीं।
कोई विलाप नहीं।

सिर्फ़ एक वाक्य —

> “वाहेगुरु,
तूने मेरी गोद को अमर कर दिया।”



ठंडे बुर्ज में
उनकी साँस थम गई।


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गुरु गोबिंद सिंह जी

उधर
गुरु जी को समाचार मिला।

उन्होंने आकाश की ओर देखा।

> “चार मुए तो क्या हुआ,
जीवित कई हज़ार।”




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इतिहास का निष्कर्ष

आज —

वज़ीर ख़ान इतिहास के हाशिए पर

गंगू घृणा का प्रतीक


और —

साहिबज़ादे
हर दिल में जीवित।


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उपसंहार

यह कहानी
सिर्फ़ अतीत नहीं।

यह प्रश्न है —

> “जब धर्म, सच और आत्मसम्मान पर बात आए,
तो क्या हम भी
उन दीवारों की तरह
अडिग रह पाएँगे?”




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